बंगाल में ‘दीदी’ भारी या मोदी, जानिए किसकी कितनी तैयारी

बंगाल में ‘दीदी’ भारी या मोदी,  जानिए किसकी कितनी तैयारी

बंगाल की खाड़ी से आने वाला तूफान अक्सर देश के मौसम का मिजाज बदल देता है। लेकिन एक तूफान की आहट आजकल बंगाल की सियासत में भी सुनाई पड़ रही है, जो इस राज्य की राजनीति का मिज़ाज बदल सकती है। छह महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं और इस वक्त तक सबसे बड़ा सियासी सवाल ये है कि क्या दस साल पहले तीन दशकों तक लाल झंडे का गढ़ रहे बंगाल में भगवा झंडा वालों का परचम लहरा सकता है। स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, रवींद्र नाथ टैगोर जैसे महापुरुष जिस धरती की पहचान रहे हैं, उसकी पहचान अब राजनीतिक हिंसा हो गई है। राज्य की सियासत रक्तरंजित है और जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे, राजनीतिक हिंसा का खेल और भी ज्यादा बढ़ने की आशंका सताने लगी है। विधानसभा चुनाव आने पर राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो जाती हैं, लेकिन चुनाव से 6 महीने पहले इतने सियासी दांवपेंच पिछले कई दशकों में नहीं देखे गए। ‘’मां, माटी, मानुष’’ का नारा देकर 10 साल से बंगाल की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी अपनी पुरानी छवि बरकरार नहीं रख पाई हैं। लोकसभा नतीजों से उत्साहित बीजेपी ने बंगाल का क़िला जीतने के लिए अपनी सारी ताक़त झोंक दी है।

कई दशकों तक बंगाल पर राज करने वाले वामपंथ और कांग्रेस के कमजोर पड़ने से जो राजनीतिक मौके सामने आए हैं, उन पर बीजेपी की नज़र है। बंगाल में बीजेपी की ताक़त और कामयाबी का बढ़ता ग्राफ इस बात का गवाह है कि ममता बनर्जी को इस चुनाव में पिछले 10 साल की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मात्र 10 फीसदी वोट मिले थे और सिर्फ तीन सीटों से संतोष करना पड़ा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत चार गुना हो गया। 40 फीसदी वोट के साथ बीजेपी ने 18 सीटें जीतीं। अगर लोकसभा चुनाव चुनाव को आधार बनाया जाए तो टीएमसी को 164 और बीजेपी को 121 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी। इन नतीजों से बीजेपी के हौसले इतने बुलंद हैं कि जिस पार्टी के राज्य में सिर्फ 3 विधायक हैं, उसने अगले चुनाव में 294 में से 200 सीटें जीतने का दावा कर दिया है। चुनाव चर्चा के दौरान जब भी इन नतीजों की याद दिलाई जाती है, तो टीएमसी नेता कहते हैं कि 2109 का चुनाव केंद्र की सरकार के लिए था और 2021 का चुनाव राज्य की सरकार के लिए है। लिहाजा, इस बार वोटर के सामने मुद्दे अलग होंगे। दावे चाहे जो हों, टीएमसी के अंदरखाने में भी बीजेपी की तैयारी को लेकर डर सताने लगा है। बीजेपी को भी पता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मुद्दे बदल जाते हैं। लिहाजा, भ्रष्टाचार, हिंसा, टोल टैक्स के साथ-साथ घुसपैठ और हिंदू मान्यतों की अनदेखी जैसे मुद्दों के साथ बीजेपी बंगाली वोटर की पहली पसंद बनने की तैयारी में लगी है।

लड़ाई की पूरी रणनीति बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व की देखरेख में चल रही है। चार लेबल पर टीमें बनाकर तैयारी की जा रही है। बूथ, पंचायत, विधानसभा और जिला स्तर पर टीमों का गठन हो रहा है। ‘’एक बूथ पर दस यूथ’’ की परिपाटी पर काम हो रहा है। बीजेपी ने इसी फॉर्मूले से 2017 में यूपी के चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। बंगाल को पांच जोन में बांट कर हर जोन का नेतृत्व एक बड़े नेता को सौंपा गया है।

बीजेपी का सबसे ज्यादा जोर आदिवासी इलाकों पर है। आदिवासी समाज को बीजेपी ये समझाने में लगी है कि मोदी सरकार की जो योजनाएं उनको फायदा पहुंचा सकती थीं, उन्हें ममता ने बंगाल में लागू ही नहीं होने दिया। पिछ़ड़े समाज के वोट बैंक को भी अपने तरफ लाने के लिए बीजेपी पूरी रणनीति के साथ काम कर रही है।  बीजेपी के अंदर भी बहुत कम लोगों को ये पता है कि बिहार में बारहवीं पास रेणु देवी को डिप्टी सीएम बनाने के पीछे एक वजह ये भी है कि बंगाल में उनकी ससुराल है। उनकी ससुराल के लोग कोलकाता के संतरागाछी इलाके में रहते हैं। फर्राटेदार बांग्ला बोलने वाली रेणु देवी बंगाल चुनाव में बीजेपी का एक ट्रंप कार्ड होंगी।

बीजेपी को उत्तर बंगाल की 54 सीटों पर भी काफी फायदा मिलने की उम्मीद है। ये वो इलाका है जहां बांगलादेश से पलायन कर आए हिंदुओं की संख्या काफी ज्यादा है। लोकसभा चुनाव में भी यहां बीजेपी को बड़ी कामयाबी मिली थी। बंगाल में बीजेपी ने किसी नेता को सीएम पद के तौर पर पेश नहीं किया है। चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा। मोदी के नाम और मोदी सरकार के काम को भुनाने में बीजेपी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही। बंगाल में बाउल संगीत से जुड़े लोगों की तादाद अच्छी खासी है। बाउल बंगाल का आध्यात्मिक लोक संगीत है, जिसका जन्म बंगाल की माटी में ही हुआ है। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी ने बाउल सिंगर्स के सहारे मोदी सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार कराने का फैसला किया है। बाउल संगीत से जुड़े लोगों में हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के सिंगर होते हैं। ट्रेनों और सड़कों पर घूम-घूम कर गीत गाने वाले ये सिंगर जब मोदी का प्रचार करेंगे तो ममता के वोट बैंक में सेंध लग सकती है।

आरएसएस पिछले कई साल से बंगाल में बीजेपी की नींव तैयार कर रहा है। संघ की शाखाएं साल दर साल लगातार बढ़ती जा रही हैं। आरएसएस की सालों की इस मेहनत का फायदा भी वोटिंग के दौरान पड़ सकता है। बीजेपी की तैयारियां केंद्रीय नेतृत्व की देखरेख में हो रही हैं, तो टीएमसी की रणनीति प्रशांत किशोर तय कर रहे हैं। उनकी कंपनी आईपीएसी को ममता बनर्जी ने बीजेपी के चुनावी चक्रव्यूह की काट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रशांत किशोर के पार्टी में बढ़ते दखल से टीएमसी के कई नेता अंदर ही अंदर नाराज़ हैं, तो कई खुलेआम विरोध करने लगे हैं। पीके से नाराज़ नेताओं का कहना है कि अब हम क्या एक ठेकेदार से राजनीति सीखेंगे। मिहिर गोस्वामी, नियामत शेख जैसे पार्टी के विधायक सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके हैं। ममता की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होती दिख रहीं। सिंगूर आंदोलन में ममता के साथी रहे रवींद्रनाथ भट्टाचार्यी और नंदीग्राम आंदोलन में ममता के साथी रहे कैबिनेट मंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने भी बग़ावत कर दी है। सुवेन्दु को मनाने के लिए प्रशांत किशोर उनके घर भी गए थे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई और पीके को सुवेन्दु के पिता और टीएमसी सांसद शिशिर अधिकारी से ही बातचीत कर लौट आना पड़ा।

बीजेपी और टीएमसी की लड़ाई के बीच ओवैसी ने भी बंगाल चुनाव लड़ने का ऐलान कर डाला है। ओवैसी ने ममता बनर्जी को गठबंधन का ऑफर दिया है, और ये दलील दी है कि गठबंधन हुआ तो बीजेपी के बढ़ते कदमों को रोका जा सकेगा। दक्षिण बंगाल की 85 सीटों पर मुसलमान वोटर अहम रोल में होते हैं। मुस्लिम वोट में बंटवारा बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है। ओवैसी अगर बिना गठबंधन के चुनाव लड़े तो जिस तरह बिहार के सीमांचल में उन्होंने महागठबंधन का खेल खराब किया था, वैसे ही मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जैसे जिलों में वो टीएमसी की नैया डूबा सकते हैं। बिहार के नतीजों के बाद ममता को भी ओवैसी का डर सता रहा है। एमआईएम ने पांच सीटों पर जीत हासिल की और 15 पर महागठबंधन का खेल खराब कर दिया। लेकिन ममता के लिए ओवैसी की पार्टी से गठबंधन करना आसान काम नहीं है। गठबंधन हो गया तो बीजेपी ओवैसी का नाम लेकर हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण करा सकती है।

असली लड़ाई टीएमसी और बीजेपी के बीच है। लेकिन कई सीटों पर सीपीएम-कांग्रेस का गठजोड़ मुक़ाबले को त्रिकोणिय बना सकता है। मंगलवार की रात दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत हुई है और बंगाल में दोनों दलों की जो हालत हो गई है, उसमें साथ चुनाव लड़ने के अलावा इनके पास कोई और चारा नहीं है। ऐसे में दोनों का गठबंधन करीब-करीब तय माना जा रहा है। ज़मीन पर जो हालात हैं, उसमें वामपंथ की मौजूदगी कुछ खास नहीं दिख रही है। लेकिन बंगाल की राजनीति में हासिए पर जा चुका लेफ्ट बिहार चुनाव के नतीजों से उत्साहित होकर खुद के मुख्य मुकाबले में होने का दंभ भर रहा है। बिहार में वामपंथी दल 30 सीटों पर लड़े थे और 16 पर जीत मिली है। लेफ्ट इसे लाल झंडे की वापसी का संकेत बता रहा है।

2014 लोकसभा चुनाव के वक्त से बीजेपी ने कई मुश्किल लड़ाइयां जीत कर अपनी रणनीति का लोहा मनवाया है। लेकिन जितनी ताक़त उसने बंगाल में लगाई है, उतना कहीं और देखने को नहीं मिला है। जनसंघ के जन्मदाता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि है बंगाल। बंगाल में भगवा लहरा कर बीजेपी अपने सबसे बड़े नेता को श्रद्धांजलि देना चाहती है। बीजेपी का सपना 2021 में ही पूरा करना है या पांच साल तक और इंतज़ार कराना है, इसका फैसला बंगाल की जनता को करना है।

आर के सिंह सलाहकार संपादक

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