बिहार चुनाव में मोदी का ‘सूरत फॉर्मूला’

बिहार चुनाव में मोदी का ‘सूरत फॉर्मूला’

बिहार का चुनाव राजनीति की नई प्रयोगशाला साबित होने जा रहा है। 2020 बिहार चुनाव में बीजेपी 2017 गुजरात चुनाव वाला दांव खेल रही है। ‘सूरत फॉर्मूला’ अपनाकर सरकार बचाने की कवायद चल रही है। ये वो फॉर्मूला है जिससे बीजेपी ने पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव में हारी हुई बाजी जीत ली थी।

2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार करीब-करीब तय हो गई थी। पटेल आंदोलन चरम पर था और जीएसटी ने व्यापारियों का इतना बुरा हाल कर दिया था कि सूरत रीजन के कारोबारियों का धंधा चौपट हो गया था। जीएसटी से पहले नोटबंदी ने भी बिजनेस में बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया था। कोई कारोबारी बीजेपी को वोट देने के लिए तैयार नहीं था। बीजेपी के मंत्री और विधायक वोट मांगने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। सबसे ज्यादा गुस्से में व्यापारियों के नौजवान बेटे थे, जो बीजेपी का नाम सुनने के लिए तैयार नहीं थे। राहुल गांधी अपनी हर रैली में ‘गब्बर सिंह टैक्स’ वाला जुमला उछालते थे और मतदाताओं पर इसका असर भी पड़ रहा था। वोटर को मनाने की बीजेपी की सारी कोशिशें जब नाकाम होती दिखने लगीं तो वोटिंग से पहले अमित शाह सूरत पहुंचे। व्यापारियों की मीटिंग बुलाई और नौजवान कारोबारियों से लंबी बातचीत की। अमित शाह ने कहा – “आप लोग बीजेपी को वोट नहीं देना चाहते तो मत दीजिए, लेकिन फाइनल फैसला लेने से पहले अपने परिवार के बुजुर्गों से एक बार अपने शहर का इतिहास पूछ लीजिएगा। बीजेपी के शासन से पहले कारोबार करना कितना मुश्किल था, कानून-व्यवस्था का क्या हाल था, ये आप लोगों ने देखा नहीं है क्योंकि उस वक्त आप लोग बच्चे थे। अपने पिता और दादा से एक बार बात कर लीजिए और तय कर लीजिए क्या करना है। सरकार बदलने पर हालात बदले तो क्या आप सकून से रह पाएंगे और क्या आज की तरह कारोबार कर पाएंगे”। यही संदेश बीजेपी ने पूरे गुजरात की जनता तक पहंचाया। अमित शाह की इस बैठक ने कमाल कर दिया। हवा का रुख बदल गया और सबसे हैरान करने वाले नतीजे सूरत रीजन में आए। सूरत जिले की 16 में से 14 सीटों पर बीजेपी को जीत नसीब हुई।

अब आते हैं बिहार पर। तेजस्वी यादव की रैलियों में उमड़ती भीड़ ने एनडीए की चिंता बढ़ा दी है। जनता के एक बड़े वर्ग में नीतीश से नाराजगी है। रोजगार का मुद्दा सरकार के लिए गले में हड्डी फंसने जैसा होता जा रहा है। कई इलाकों में नारा लग रहा है – “मोदी से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं।“ बीजेपी से लेकर जेडीयू तक सबको पता है कि मोदी की लोकप्रियता ही अब एनडीए की नैया पार करा सकती है। ऐसे में मोदी ने नीतीश की तरफ चलने वाले हर तीर के ढाल के तौर पर गुजरात चुनाव वाला दांव खेल दिया है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री की बिहार में तीन रैलियां थीं। अपनी हर रैली में मोदी ने लालू यादव के जंगल राज की याद दिलाई और वोटर तक ये मैसेज पहुंचाया कि आरजेडी का शासन वापस आया तो पुराने दिन लौट सकते हैं। मोदी ने कहा – “बिहार के लोग वो दिन नहीं भूल सकते जब सूरज ढलने के साथ सबकुछ बंद हो जाता था। रात में ट्रेन से उतरने वाले सुबह तक स्टेशन पर ही रात बिताते थे और सुबह होने पर घर जाते थे। आप याद कीजिए वो दौर जब लोग गाड़ी नहीं खरीदते थे ताकि कमाई का पता न चल सके। एक शहर से दूसरे शहर जाते वक्त ये पता नहीं होता था कि मंज़िल तक पहुंच पाएंगे या किडनैप हो जाएंगे।“ प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि तब ना बिजली थी ना सड़क। आज बिहार में बिजली और सड़क सब कुछ दुरुस्त है। अपनी जनसभाओं में मोदी ने सबसे ज्यादा युवा मतदाताओं को समझाने की कोशिश की और कहा कि आज बिहार में पीढ़ी बदल गई है, लेकिन नौजवानों को याद रखना होगा कि बिहार को इतनी मुश्किलों में डालने वाले कौन लोग थे।

ये बात सौ फीसदी सच है कि नई पीढी ने वो दौर देखा नहीं है, सिर्फ सुन रखा है जिसके गवाह उनके माता-पिता रह चुके हैं। मूलभूत सुविधाओं से लेकर विकास और कानून-व्यवस्था तक का जो हाल था, उसका दंश हर जाति-वर्ग ने झेला है। पिछले 15 साल में बिहार के लोग वो दौर भूल चुके हैं, लेकिन मोदी ने अब दुखती रग पर हाथ रख दिया है। प्रधानमंत्री अपनी हर रैली में पुराना दौर याद दिलाते रहेंगे और नीतीश से नाराज़ मतदाता को समझाने-बुझाने का काम करते रहेंगे। जवाब में तेजस्वी यादव और राहुल गांधी अपनी रैलियों में बेरोजगारी का मुद्दा उठा रहे हैं। दोनों नेता लॉकडाउन के दौरान देश के कोने-कोने से पैदल लौटने को मजबूर हुए मजदूरों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। अब फैसला जनता को करना है कि नीतीश कुमार चाहिए या तेजस्वी यादव। क्या जंगलराज आज भी मुद्दा है? क्या जनता 15 साल पुराने दौर को ध्यान में रख कर वोट डालेगी या नए मुद्दों के आधार पर मत पड़ेंगे? सौ बात की एक बात ये है कि बिहार में एनडीए की सरकार तभी बन पाएगी जब बीजेपी का सूरत फॉर्मूला कामयाब हो पाएगा। राजनीतिक रूप से हमेशा वोकल रहे बिहार में एनडीए और महागठबंधन में से किसका लोकल मुद्दा हावी रहता है, इसका पता नतीजे सामने आने के बाद ही चल पाएगा। तब तक इंतज़ार कीजिए। बिहार चुनाव के नतीजे पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। परिणाम ये भी तय करेगा कि मोदी का नाम और काम सिर्फ केंद्र के चुनाव में असर डालता है या राज्यों के चुनाव में भी मोदी की अहमियत अभी बाकी है।

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आर के सिंह सलाहकार संपादक

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