बिहार में कांग्रेस भरोसे एनडीए

बिहार में कांग्रेस भरोसे एनडीए

बिहार में इस बार वो होने जा रहा है जो पिछले 30 साल में कभी नहीं हुआ। सियासी शतरंज की बिसात पर निगाहें बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी की चाल पर टिकी हैं, लेकिन एक मोहरा ऐसा भी है जिस पर नज़र किसी की नहीं है और सबसे अहम रोल उसी का रहने वाला है। ये मोहरा है कांग्रेस। सुनने में शायद अजीब लगे लेकिन सच्चाई ये है कि तीन दशक बाद शायद पहली बार शायद कांग्रेस फैक्टर सरकार बनाने और बिगाड़ने के खेल में बड़ी भूमिका में है। बिहार में तेजस्वी यादव के लिए सरकार बनाना आसान नहीं होगा और अगर सरकार बन भी गई तो बचाना आसान नहीं होगा। वजह है कांग्रेस। महागठबंधन के कोटे में कांग्रेस को 70 सीटें मिली हैं। तेजस्वी मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं, ये इस बात पर निर्भर है कि कांग्रेस कितनी सीटें जीत पाती है। अगर कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब रहा तो फायदा सीधे एनडीए को मिलेगा और महागठबंधन बहुमत से दूर रह सकता है। कांग्रेस का जनाधार बिहार में बचा नहीं है और जो भी वोट मिलना है वो इस बात पर निर्भर करेगा कि कैंडिडेट कितना मजबूत है और आरजेडी का वोट बैंक कांग्रेस उम्मीदवार की तरफ कितना ट्रांसफर हो पाता है। मान लीजिए अगर कांग्रेस की सफलता का ग्राफ उतना ही ऊंचा रहता है जितना आरजेडी का रहता है तब भी राहें उतनी आसान नहीं हैं, जितनी लग रही हैं। बहुमत मिलने पर तेजस्वी यादव की सरकार बन तो जाएगी, लेकिन टिक पाएगी इसकी गारंटी नहीं है। पिछले कुछ सालों का सियासी इतिहास गवाह है कि लालच और महत्वकांक्षा की गाड़ी पर सवार कांग्रेस के विधायक कभी भी टूट सकते हैं और बीजेपी की बस पर सवार होकर पलायन भी कर सकते हैं। तेजस्वी के पास अनुभव की कमी है, लालू यादव जेल में हैं और आरजेडी में कोई ऐसा कद्दावर नेता है नहीं जो बीजेपी के साम-दंड-भेद के चक्रव्यूह को आसानी से भेद सके। चुनाव नतीजों के बाद एनडीए अगर सरकार बनाने में नाकाम रहती है तब भी वो हार नहीं मानने वाली। महज छह महीनों में ही बिहार का सियासी मानचित्र बदल सकता है। यानी कुल मिलाकर कहानी ये है कि बिहार में इस बार एनडीए कांग्रेस भरोसे है। कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा तब तो एनडीए की सरकार बनेगी ही, कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहने पर भी भविष्य में एनडीए की सरकार बनने की उम्मीद कायम रहेगी।

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आर के सिंह सलाहकार संपादक

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