मोदी का आशीर्वाद है, बिहार में एक बार फिर नीतीशे कुमार हैं

मोदी का आशीर्वाद है, बिहार में एक बार फिर नीतीशे कुमार हैं

बिहार के चुनाव में धूल चेहरे पर लगी थी, और विपक्ष आईना साफ करता रह गया। सावधानी हटी और विपक्ष के साथ दुर्घटना घटी। इतिहास गवाह है कि लड़ाइयां सिर्फ बल से नहीं जीती जातीं, रणनीति और कुशल प्रबंधन से भी हारी हुई बाजी पलटी जा सकती है। बिहार के चुनाव में भी देश ने यही देखा। जीत और हार का फैसला अंतिम ओवरों के प्रदर्शन पर होना था। विपक्ष अपनी विजय तय मानकर उलटे-सीधे शॉट लगा बैठा और मोदी ने स्लॉग ओवर में एक के बाद एक यॉर्कर फेंक कर विरोधियों को क्लीन बोल्ड कर दिया।

2020 के बिहार चुनाव में बीजेपी ने वही दांव खेला, जो 2017 के गुजरात चुनाव में चला था। ‘’सूरत फॉर्मूला’’ अपनाया गया और प्रधानमंत्री ने बिहार की अपनी हर चुनावी रैली में बिहार की नई पीढ़ी को 15 साल पहले के जंगलराज की याद दिलाई। युवा पीढ़ी के लिए हीरो बने तेजस्वी को ‘’जंगलराज का युवराज’’ बताकर बार-बार जनता के मन में ये बात बिठा दी कि अगर वोटर ने लालटेन जलाई तो घर में रोशनी नहीं अंधेरा आएगा। तीन साल पहले भी बीजेपी ने नोटबंदी और जीएसटी से नाराज़ सूरत रेंज के युवा व्यापारी मतदाताओं को यही बताकर डराया था कि अगर सत्ता में कांग्रेस आ गई तो खराब कानून-व्यवस्था का पुराना दौर वापस लौट सकता है। नतीजा ये हुआ था कि सूरत की 16 में से 14 सीटों पर बीजेपी को ऐतिहासिक जीत हासिल हो गई। इस बार बिहार में भी बीजेपी ने इसी फॉर्मूले के दम पर 110 में से 74 सीटों पर जीत हासिल कर ली और नीतीश सरकार से जबर्दस्त नाराज़गी के बावजूद 125 सीटें हासिल कर एनडीए को बहुमत दिला दिया।

सीटों का ये आंकड़ा बहुत बड़ा हो सकता था अगर चिराग पासवान ने भी एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ा होता। 2 दर्जन से भी ज्यादा सीटों पर एलजेपी ने बीस हज़ार तक वोट काट कर जेडीयू का स्ट्राइक रेट खराब कर दिया। सीट भले ही एक मिली हो, साढ़े 5 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल कर चिराग पासवान की पार्टी ने ये साबित कर दिया कि बिहार के पासवान वोटरों पर रामविलास के सियासी वारिस का असर अब भी बरकरार है और उनके साथ गठबंधन करना किसी भी सियासी दल के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

सियासत में काफी अनुभवी मोदी के दांव-पेंच के आगे तेजस्वी भले ही जीत के कगार पर पहुंच कर हार गए, लेकिन उन्होंने ये जरूर साबित कर दिया है कि लालू यादव की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की क्षमता उनमें है। एनडीए की जीत की वजह मोदी तो थे ही, सीमांचल में ओवैसी की कामयाबी और कांग्रेस का नकारापन भी बड़ा फैक्टर रहा है। मोदी ने सिर्फ तेजस्वी को नहीं हराया, नीतीश कुमार पर भी मनोवैज्ञानिक जीत हासिल की है। सातवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की तैयारी में लगे नीतीश को हर पल इस बात का एहसास रहेगा कि मुख्यमंत्री की जिस कुर्सी पर वो बैठे हैं, उसके असली हकदार वो नहीं हैं। ये गद्दी उधार की है और वो हमेशा-हमेशा के लिए मोदी के कर्जदार हो गए हैं। वैसे कर्जदार तो मोदी भी हैं। ये कर्ज है बिहार की जनता का जिसने विपरित परिस्थितियों में मोदी का साथ देकर उनका मान-सम्मान बढ़ाने का काम किया है। अब बिहार के विकास के लिए काम कर मोदी को ये कर्ज उतारना होगा।

बिहार का चुनाव हर राजनीतिक दल के लिए एक केस स्टडी है और इस चुनाव में कई मिथक भी टूटे हैं। मिथक ये टूटा है कि कोरोना काल में आई बेरोजगारी और मजदूरों के पलायन के बावजूद मोदी के नाम और काम पर वोटर का भरोसा 6 साल बाद भी कमजोर नहीं हुआ है। राज्य का चुनाव आज भी केंद्र सरकार के कामकाज के नाम पर जीता जा सकता है। विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे आज भी चलते हैं और मोदी-नीतीश को लेकर आधी आबादी का क्रेज अब भी खत्म नहीं हुआ है। बिहार के चुनाव ने ये भी साबित किया है कि रैलियों में उमड़ी भीड़ जीत की गारंटी नहीं होती है। पिछले 6 साल में मोदी और बीजेपी के सियासी दांव से बड़े-बड़े सूरमा हवा हो गए। केंद्र में राहुल गांधी, यूपी में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी यादव के सपने तो चकनाचूर हो चुके हैं, अब अगला टारगेट ममता बनर्जी हैं। ‘’दीदी’’ को सावधान रहना होगा, वरना मोदी एंड कंपनी बंगाल में भी नया इतिहास लिख सकती है।

आर के सिंह सलाहकार संपादक

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