‘मोदी’ हैं तो बिहार में बीजेपी की बर्बादी मुमकिन है?

‘मोदी’ हैं तो बिहार में बीजेपी की बर्बादी मुमकिन है?

बिहार चुनाव में आजकल सबसे ज्यादा चर्चा मोदी नाम की है। बड़े वाले मोदी नहीं, छोटे वाले मोदी। गुजरात वाले मोदी नहीं, बिहार वाले मोदी। चौक-चौराहों की चुनावी चकल्लस में ये बात आम है कि बिहार में बीजेपी को सुशील मोदी ने जितना नुकसान पहुंचाया, उतना तो शायद लालू और नीतीश ने भी नहीं पहुंचाया होगा। टिकट बंटवारे के बाद नाराज़गी और बग़ावत से कोई दल अछूता नहीं रहता, लेकिन 2020 की महाभारत में बीजेपी में ये एक अलग स्तर पर पहुंच गया है।

पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जा चुके राजेंद्र सिंह और रामेश्वर चौरसिया जैसे बड़े और समर्पित नेताओं सहित कई कद्दावर नेताओं ने एक झटके में पार्टी का दामन छोड़ दिया है। चुनाव मैदान में भी उतर गए हैं। बात सिर्फ टिकट की नहीं थी, बिहार में पार्टी की अगुवाई करने वालों की नीयत और रवैये ने भी आग में घी डालने का काम किया। बग़ावत के लिए मजबूर करने वालों में सबसे पहला नाम उस नेता का आ रहा है, जो पिछले 2 दशक से नीतीश के पिछलग्गू की भूमिका में हैं। नरेंद्र मोदी के नाम और काम का असर आज भी बिहार में कम नहीं है। बिहार में बीजेपी के पास छोटे भाई से बड़ा भाई बनने की संभावनाएं महाराष्ट्र से काफी ज्यादा थीं। लेकिन जब राज्य में पार्टी की अगुवाई करने वाला ही जेडीयू की बी टीम की तरह काम कर रहा हो, तो फिर ये दिन तो देखना ही था। बाग़ी भले ही जीत ना पाएं, बीजेपी और जेडीयू का खेल जरूर बिगाड़ सकते हैं। बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित हों या गली-मोहल्ले के चुनावी विश्लेषक, सबका मानना है कि छोटे मोदी को जो पसंद नहीं आता, उसे ठिकाने लगा दिया जाता है, चाहे उसकी जड़ें पार्टी में कितनी भी गहरी क्यों ना रही हों। बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। लोकसभा चुनाव में तो छोटी से छोटी बात बीजेपी आलाकमान तय करता है, विधानसभा चुनाव में नीतीश अपना एजेंडा चलाने में कामयाब रहते हैं। बीजेपी के किसी नेता ने अगर नीतीश पर मुखर होकर बोला तो उसका टिकट मिलना नामुमकिन जैसा हो जाता है। कैंची छोटे मोदी की होती है, लेकिन उसे चलाते तो नीतीश ही हैं। राजेंद्र सिंह जैसे नेता का बीजेपी से बग़ावत करना महज एक ख़बर नहीं संकेत है। संघ कार्यकर्ताओं की नाराजगी का संदेश है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कामरुप तक बीजेपी का कोई भी उम्मीदवार चुनाव जीतता है तो उसमें आरएसएस के कर्मठ और निष्ठावान कार्यकर्ताओं का थोड़ा या बहुत योगदान जरूर रहता है। लेकिन बिहार चुनाव में संघ के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा हुजूम संघ प्रचारक और कई राज्यों में बीजेपी के संगठन मंत्री रह चुके राजेंद्र सिंह के समर्थन में दिनारा पहुंचने लगा है। तो क्या ये मान लिया जाए कि इस बार संघ के समर्थक एनडीए उम्मीदवारों के साथ जी-जान से नहीं लगे हैं। क्या इसका खामियाजा पार्टी को चुनाव परिणाम के वक्त भुगतना पड़ सकता है। पिछले 5 साल के खराब काम-काज की वजह से बिहार के कई इलाकों में नीतीश के ख़िलाफ़ बहती बयार साफ-साफ महसूस की जा सकती है। बागियों की वजह से अगर वोटिंग के दिन तक ये बयार आंधी बन गई तो सिर्फ जेडीयू नहीं उड़ेगी, बीजेपी भी धूल फांक सकती है।

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आर के सिंह सलाहकार संपादक

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