किसान सड़क पर हैं, राहुल गांधी घर पर हैं

किसान सड़क पर हैं, राहुल गांधी घर पर हैं

“राजनीति विज्ञान का जनक’’ कहे जाने वाले महान दार्शनिक अरस्तु ने कहा था – “मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है।“ लेकिन अगर राजनीति की दुनिया में एक बड़ी जिम्मेदारी वाले पद पर बैठा व्यक्ति ही राजनीतिक प्राणी जैसा व्यवहार ना करे तो उसके बारे में क्या कहा जाए। वही कहा जाएगा जो शरद पवार ने कहा है। एक इंटरव्यू में पवार ने कहा है कि राहुल गांधी में निरंतरता की कमी दिखती है। सहयोगी दल के मुखिया के इस बयान पर सार्वजनिक तौर पर तो कांग्रेस नेताओं ने नाराज़गी जताई है, लेकिन खुद राहुल गांधी की पार्टी के नेता भी ये जानते, मानते और समझते हैं कि शरद पवार ने जो कहा है उसमें ग़लत कुछ भी नहीं है। राहुल राजनीति तो करते हैं, लेकिन उनमें लगन का अभाव दिखता है। पॉलिटिक्स एक फुल टाइम जॉब है, लेकिन राहुल गांधी का हमेशा इससे “हिट एंड रन” वाला नाता रहा है। वो अचानक आते हैं। हमला बोलते हैं। संघ, बीजेपी, मोदी, अमित शाह, अंबानी, अदानी सबको एक सुर में टारगेट करते हैं और फिर चुपके से गायब हो जाते हैं।

शरद पवार का बयान जितना अहम है, उतनी ही अहमियत उनके बयान की टाइमिंग की है। किसान आंदोलन चल रहा है। देश का अन्नदाता दिल्ली घेर कर बैठा है। किसानों ने केंद्र सरकार की नाक में दम कर रखा है। सरकार से कई दौर की बातचीत फेल हो चुकी है। ये हासिए पर चल रहे विपक्ष के लिए एक गोल्डेन चांस है। कई विपक्षी दलों के नेता सड़क पर दिख भी रहे हैं। लेकिन राहुल कहां हैं? ना कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस, ना सड़क पर उतर कर आंदोलन, राहुल गांधी घर पर हैं। खानापुर्ति के लिए उनकी टीम बीच-बीच में ट्वीट करती रहती है और जिम्मेदारी पूरी मान लेती है। जब नेता के जुनून का ये हाल है तो कार्यकर्ताओं का जोश कितना हाई रहेगा, ये समझा जा सकता है। ना तो कहने की जरूरत है, ना बताने की जरूरत है, ये सबको दिखता रहता है कि राहुल गांधी के विरोध में जो सियासी दल खड़ा है उसके नेता और कार्यकर्ता ज़मीन पर कितनी मेहनत करते हैं।

शरद पवार ने जो सवाल उठाया है, वैसा ही सवाल कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता भी उठा चुके हैं। पार्टी के 23 शीर्ष नेता अलाकमान को चिट्ठी भी लिख चुके हैं। इशारा साफ है कि निशाना किधर है। ये अचानक नहीं हुआ है। ये तब हुआ है जब सब्र का बांध टूट गया और पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व तो गांधी जी के तीन बंदर बना बैठा है। ना तो उसे राहुल के विरोध में कुछ सुनना है, ना कुछ कहना है, ना कुछ देखना है। नतीजा सामने है। पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और जिन राज्यों में उसकी सरकारें बची हैं वहां पार्टी की लीडरशिप का नहीं स्थानीय क्षत्रप का योगदान ज्यादा है।

किसान आंदोलन राहुल गांधी के लिए एक ‘रिलॉन्च पैड’ का काम कर सकता था। ये आजमाया हुआ फॉर्मूला था। याद कीजिए 2011 में यूपी के भट्टा परसौल में ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसान आंदोलन चरम पर था और राहुल अचानक बाइक पर सवार होकर ग्राउंड ज़ीरो पर किसानों के बीच पहुंच गए थे। राहुल की इस मुहिम को गंभीरता से लिया गया। एक गंभीर राजनेता के तौर पर उनकी पहचान बनने लगी थी। लेकिन बाद के वर्षों में राहुल ने वो निरंतरता नहीं दिखाई। नतीजा ये हुआ कि वो मोदी-अमित शाह की जोड़ी के सामने मुक़ाबले में नहीं टिक सके। एक बार फिर किसान आंदोलन ने राहुल को वापसी का मौका दिया था। लेकिन गांधी परिवार के वारिस ये मौका चूक गए। किसान हर राज्य में बहुतायत में हैं, उनकी समस्याएं हमेशा विकराल रहती हैं, राहुल इस मौके का फायदा उठाकर अपनी पार्टी को एक सशक्त विपक्ष के तौर पर और खुद को गंभीर राजनेता के तौर पर जनता के सामने पेश कर सकते थे। लेकिन ये हो ना पाया और इसलिए नहीं हुआ क्योंकि राहुल गांधी ने कोशिश ही नहीं की। ऐसा लगता है जैसे राहुल ने हथियार डाल दिए हैं।

राहुल गांधी की सियासत और सियासी समझ पर कोई पहली बार सवाल नहीं उठे हैं। शरद पवार से कुछ दिन पहले बराक ओबामा की भी राहुल के बारे में राय दुनिया के सामने आई थी। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी आत्मकथा “ए प्रॉमिस्ड लैंड” में राहुल गांधी का जिक्र करते हुए उन्हें नर्वस, योग्यता और जुनून की कमी वाला छात्र बताया है। ओबामा की किताब पर शुरू सियासी बवाल अभी थमा ही था कि शरद पवार का बयान आ गया। राहुल में निरंतरता की कमी है, ये विपक्ष की तरफ से अक्सर सुनने को मिलता है। खुद राहुल को भी पता है कि विरोधी उनके बारे में क्या सोचते हैं। संसद में एक बार खुद राहुल गांधी ने कह दिया था कि विरोधियों के लिए मैं पप्पू हूं। ये सच है कि राहुल की राजनीति को देश की आम जनता गंभीरता से नहीं लेती है। राहुल के पास अब भी वक्त है। कांग्रेस के इस भविष्य को हिंदुस्तान का सियासी भविष्य बनना है तो उन्हें खुद को बदलना होगा। सियासी मौकों को भुनाना होगा। सियासत करनी है तो इसे सीरियसली लेना होगा, वरना वो दुनिया के सबसे नाकाम सियासी वारिस माने जाएंगे।

आर के सिंह सलाहकार संपादक

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