हार कर जीतने वाले को तेजस्वी कहते हैं

हार कर जीतने वाले को तेजस्वी कहते हैं

पुरानी कहावत है – “एक बिहारी सौ पर भारी”। एक बार फिर ये कहावत सही साबित हुई है और इसे सही साबित किया है 31 साल के एक लड़के ने, जिसका नाम है तेजस्वी यादव।

बिहार चुनाव में एक तरफ केंद्र और राज्य सरकार की शक्ति थी, तो दूसरी तरफ जनशक्ति। एक तरफ मोदी, योगी, नीतीश जैसे देश के सबसे कद्दावर नेता खड़े थे, तो दूसरी तरफ एक अकेला महारथी तेजस्वी। चुनाव का ऐलान हुआ और धुआंधार चुनाव प्रचार शुरू हुआ। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के सबसे बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भी वो जुनून, वो लहर नज़र नहीं आई जो तेजस्वी यादव की जनसभाओं में दिखती थी। आरजेडी के इस नौजवान नेता ने दिन-रात मेहनत की। एक दिन में 15 से भी ज्यादा रैलियां की। हज़ारों की भीड़ जब तेजस्वी-तेजस्वी के नारे लगाने लगी, तो उसकी गूंज दिल्ली के सियासी गलियारों तक भी पहुंची। जो तस्वीर बिहार की चुनावी रैलियों में दिख रही थी, उसकी उम्मीद देश की सबसे बड़ी और ताक़तवर पार्टी को थी ही नहीं। मोदी-नीतीश जैसी दिग्गज सियासी हस्तियों के पसीने छूटने लगे। याद कीजिए इलेक्शन से कुछ महीने पहले तक बिहार में क्या चुनावी माहौल चल रहा था। लालू यादव जेल में थे और पार्टी में उनके कद का दूसरा कोई नेता नहीं था। सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी कांग्रेस की ताक़त कमजोर हो चुकी थी और उसके दिग्गज नेता भी जनता पर प्रभाव डालने में नाकाम साबित हो रहे थे। ऐसे मुश्किल हालात में तेजस्वी ने अकेले मोर्चा संभाला और बहुत कम वक्त में ही बिहार में हवा का रुख बदल डाला। वामपंथी दलों से गठबंधन का फैसला लेकर तेजस्वी ने ये साबित कर दिया कि राजनीति से जुड़े नीतिगत फैसले लेने की उनमें क्षमता है। जिस देश में पिछले 6 साल से हर चुनाव पाकिस्तान, कश्मीर, राष्ट्रवाद, राम मंदिर, हिंदू-मुसलमान जैसे मुद्दों पर लड़ा जा रहा है, उस देश में तेजस्वी ने रोजगार, पलायन, गरीबी को मुद्दा बना दिया। 46 फीसदी से ज्यादा बेरोजगारी दर पर सत्ता पक्ष से सवाल उठाए। जिस पार्टी के कार्यकर्ता लालू यादव के जेल में होने की वजह से निराश दिखने लगे थे, उसमें तेजस्वी के इरादों और जुनून ने उत्साह भर दिया। कुशल नेतृत्व ने जो कारनामा कर दिखाया, उसका नतीजा पूरे देश ने देखा। आरजेडी का मेकओवर हो गया। जाति और धर्म की दीवारें टूट गईं। सात करोड़ बिहारी नौजवानों के दिल की धड़कन बन गए तेजस्वी यादव। जिस पार्टी का आधार एम-वाई समीकरण बताया जाता था, वो पार्टी हर जाति-धर्म के वोटर की आवाज़ बनकर उभरी। तेजस्वी यादव ने अपनी जनसभाओं में आरजेडी को “ए टू ज़ेड” पार्टी कहा था और उनका ये दावा सही साबित हुआ। बीजेपी को एकबारगी ये लगने लगा कि आसान जीत की उम्मीद में कोरोना काल में चुनाव कराने की जल्दबाजी भारी पड़ने वाली है। साम-दाम-दंड-भेद का हर सियासी हथकंडा अपनाया गया और तेज रफ्तार तेजस्वी की सरकार बनते-बनते रह गई।

तेजस्वी यादव भले ही सरकार नहीं बना सके। तेजस्वी यादव भले ही मुख्यमंत्री नहीं बन सके। लेकिन बिहार ही नहीं, पूरे देश में ये संदेश देने में सौ फीसदी सफल रहे कि लालू यादव की विरासत को ऊंचाइयों तक ले जाने, पार्टी को एकजुट रखने, जनता के सरोकार की राजनीति करने और धर्म निरपेक्ष राजनीति को मीलों आगे ले जाने की क्षमता उनमें है। तेजस्वी ने अपनी मेहनत और लगन से ये साबित कर दिखाया कि पिछड़ों का बल और गरीब का दल कही जाने वाली पार्टी आरजेडी एक नौजवान नेता के नेतृत्व में बहुत आगे जाएगी। सरकार बनाने की लड़ाई भले ही तेजस्वी हार गए, करोड़ों दिल उन्होंने जीत लिए हैं। तेजस्वी ने ये साबित किया है कि बिना विवाद में पड़े, बिना अपशब्दों का इस्तेमाल किए, बिना किसी वर्ग को दुख पहुंचाए भी चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है। पहले अकेले अपने दम पर उन्होंने आरजेडी को सबसे ज्यादा सीटें दिलाई और अब सरकार गठन के बाद भी उन्होंने नीतीश का चैन छीन लिया है। तेजस्वी की मुहिम का ही असर है कि नीतीश को अपना शिक्षा मंत्री पदभर ग्रहण करने के महज कुछ घंटों बाद ही हटाना पड़ गया। तेजस्वी के तेवर से ये साफ है कि नीतीश सरकार की आगे की राह भी आसान नहीं रहने वाली है।

तेजस्वी अभी युवा हैं। उम्र बहुत कम है। उनके पास अभी कई दशक तक सक्रिय राजनीति में रहने का मौका है। अगले विधानसभा चुनाव तक नीतीश कुमार रिटायर नेताओं की कतार में शामिल हो जाएंगे। बीजेपी के पास बिहार में कोई बड़ा युवा नेता नहीं है। ऐसे में बिहार में तेजस्वी ही ऐसा इकलौता चेहरा हैं, जिसमें बिहार का सियासी वारिस बनने की योग्यता, क्षमता और जुनून है। महज कुछ महीने पहले तक आरजेडी और तेजस्वी यादव की राजनीतिक ताक़त को सिरे से खारिज करने वाले राजनीतिक एक्सपर्ट भी ये मानने लगे हैं कि तेजस्वी यादव बिहार में एक उम्मीद की किरण बन कर उभरे हैं। देश-दुनिया में कई कहावतें मशहूर हैं। आजकल एक कहावत बिहार में भी हर जुबान पर है – “हार कर जीतने वाले को तेजस्वी कहते हैं”।

आर के सिंह सलाहकार संपादक

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